“भारत-यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते से यूरोपीय कारों पर आयात शुल्क में भारी कटौती की आशंका से मारुति सुजुकी, महिंद्रा एंड महिंद्रा और हुंडई मोटर इंडिया जैसी कंपनियां चिंतित हैं, जिसके चलते उनके शेयर्स में 5 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। इस डील से भारतीय बाजार में विदेशी लग्जरी और प्रीमियम कारों की पैठ बढ़ सकती है, हालांकि इलेक्ट्रिक वाहनों को शुरुआती पांच वर्षों तक छूट से बाहर रखा गया है।”
भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील’ कहा जा रहा है, क्योंकि यह दशकों पुरानी वार्ताओं का परिणाम है और इससे दोनों पक्षों के बीच व्यापार में 190 अरब डॉलर से अधिक की वृद्धि की संभावना है। इस समझौते के तहत यूरोपीय कारों पर लगने वाला आयात शुल्क 110 प्रतिशत से घटकर 40 प्रतिशत तक किया जा सकता है, जो समय के साथ 10 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इससे Mercedes-Benz, BMW, Audi और Volkswagen जैसी कंपनियों की कारें भारतीय बाजार में सस्ती हो जाएंगी, जिससे घरेलू निर्माताओं पर प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ेगा।
मारुति सुजुकी, जो भारतीय बाजार में दो-तिहाई हिस्सेदारी रखती है, को किफायती कार सेगमेंट में चुनौती मिल सकती है, क्योंकि यूरोपीय ब्रांड्स अब प्रीमियम मॉडल्स को कम कीमत पर पेश कर सकेंगे। महिंद्रा एंड महिंद्रा, जो SUVs में मजबूत है, को भी यूरोपीय SUVs के आयात से बाजार हिस्सेदारी खोने का खतरा है। हुंडई मोटर इंडिया, जो मिड-साइज सेडान और क्रॉसओवर में सक्रिय है, को कोरियन-यूरोपीय कॉम्पिटीशन से प्रभावित होना पड़ सकता है, क्योंकि डील से यूरोपीय पार्ट्स की लागत कम होगी।
शेयर बाजार में इस खबर के असर से प्रमुख ऑटो कंपनियों के स्टॉक्स में तेज गिरावट देखी गई। नीचे दी गई तालिका में प्रमुख कंपनियों की शेयर कीमतों में गिरावट का विवरण है:
| कंपनी का नाम | गिरावट प्रतिशत | गिरावट राशि (रुपये में) | वर्तमान शेयर मूल्य (रुपये में) |
|---|---|---|---|
| महिंद्रा एंड महिंद्रा | 5.1% | 152.10 | 3390.50 |
| हुंडई मोटर इंडिया | 4.5% | 95.10 | 2169.35 |
| मारुति सुजुकी इंडिया | 3% | 257.60 | 15212 |
| टाटा मोटर्स | 2% | – | – |
यह गिरावट निवेशकों की उस चिंता को दर्शाती है कि कम टैरिफ से यूरोपीय कारों का आयात बढ़ेगा, जो वर्तमान में 70-110 प्रतिशत शुल्क के कारण महंगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय ऑटो सेक्टर की वैल्यूएशन प्रभावित होगी, क्योंकि घरेलू कंपनियां अब तक उच्च शुल्क की सुरक्षा में काम कर रही थीं।
डील की प्रमुख शर्तों में शामिल है कि 15,000 यूरो से अधिक कीमत वाली कारों पर तुरंत कटौती लागू होगी, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को पहले पांच वर्षों तक इस छूट से बाहर रखा जाएगा। इससे टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी कंपनियों के EV निवेश को सुरक्षा मिलेगी, जो हाल के वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर चुकी हैं। हालांकि, पांच वर्ष बाद EVs पर भी शुल्क कम होने से लंबी अवधि में चुनौती बनी रहेगी।
ऑटो सेक्टर पर व्यापक प्रभाव को देखें तो टेक्सटाइल और ज्वेलरी जैसे निर्यात क्षेत्रों को फायदा मिलेगा, लेकिन ऑटो में नुकसान की आशंका है। भारत का ऑटो बाजार 2030 तक 60 लाख यूनिट सालाना तक पहुंच सकता है, लेकिन यूरोपीय कंपनियां अब इस बाजार के 20-30 प्रतिशत हिस्से पर नजर रख रही हैं। घरेलू कंपनियों को अब इनोवेशन पर फोकस करना होगा, जैसे हाइब्रिड मॉडल्स विकसित करना या लागत कम करने के लिए सप्लाई चेन सुधारना।
प्रमुख चुनौतियां:
प्रतिस्पर्धा में वृद्धि: यूरोपीय ब्रांड्स जैसे Renault और Stellantis अब भारतीय बाजार में अधिक निवेश कर सकते हैं, जो वर्तमान में Maruti की WagonR और Swift जैसी कारों का दबदबा है।
लागत दबाव: कम शुल्क से आयातित पार्ट्स सस्ते होंगे, लेकिन घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को प्राइस वॉर में उतरना पड़ेगा।
रोजगार प्रभाव: ऑटो सेक्टर में 4 करोड़ से अधिक रोजगार हैं, और बाजार हिस्सेदारी घटने से नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।
एक्सपोर्ट अवसर: हालांकि, ऑटो एंसिलरी कंपनियां जैसे Bharat Forge और Craftsman Automation को यूरोपीय OEM से ऑर्डर मिल सकते हैं, जो सेक्टर के कुछ हिस्सों को लाभ पहुंचाएगा।
एक्सपर्ट्स की राय में, यह डील भारत के लिए रणनीतिक है, क्योंकि इससे फार्मा और केमिकल सेक्टर में 99.5 प्रतिशत निर्यात पर छूट मिलेगी। लेकिन ऑटो सेक्टर को अनुकूलन के लिए नीतियां जैसे सब्सिडी या R&D फंडिंग की जरूरत पड़ेगी। मेटल सेक्टर में Tata Steel और JSW Steel को सीमित लाभ मिल सकता है, जबकि झींगा एक्सपोर्टर्स और ज्वेलरी रिटेलर्स को बड़ा फायदा होगा।
सेक्टर-विशिष्ट प्रभाव की तालिका:
| सेक्टर | सकारात्मक प्रभाव | नकारात्मक प्रभाव |
|---|---|---|
| ऑटो मैन्युफैक्चरिंग | एंसिलरी पार्ट्स एक्सपोर्ट में वृद्धि | घरेलू बाजार में यूरोपीय कॉम्पिटीशन |
| EVs | शुरुआती सुरक्षा, लंबी अवधि में अवसर | पांच वर्ष बाद शुल्क कटौती से चुनौती |
| लग्जरी कार | सस्ती आयात से बाजार विस्तार | घरेलू प्रीमियम ब्रांड्स पर दबाव |
| निर्यात सेक्टर | टेक्सटाइल, फार्मा में 6% कोटा छूट | कृषि और स्टील पर सीमित ड्यूटी |
यह स्थिति दर्शाती है कि जबकि डील समग्र अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है, ऑटो सेक्टर को तत्काल रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता है ताकि वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।
Disclaimer: यह लेख समाचार, रिपोर्ट और टिप्स पर आधारित है। स्रोतों का उल्लेख नहीं किया गया है।