“क्रेडिट कार्ड की लिमिट आपके इनकम, क्रेडिट स्कोर, मौजूदा कर्ज और RBI के सख्त नियमों पर आधारित होती है। बैंक कुल उपलब्ध क्रेडिट को देखते हुए जिम्मेदारी से लिमिट तय करते हैं, जबकि हाल के नियमों से ओवरलिमिट पर ग्राहक की स्पष्ट सहमति जरूरी हो गई है।”
क्रेडिट कार्ड जारी करने वाले बैंक और NBFC आपकी क्रेडिट लिमिट तय करने के लिए कई फैक्टरों का मूल्यांकन करते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और RBI के दिशा-निर्देशों के अनुसार होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्राहक को ओवर-बॉरोइंग से बचाना और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना है।
सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर आपकी मासिक या वार्षिक आय है। बैंक आमतौर पर आपकी इनकम को आधार बनाकर लिमिट तय करते हैं। एंट्री-लेवल कार्ड्स के लिए न्यूनतम मासिक वेतन 15,000 से 25,000 रुपये तक माना जाता है, जबकि प्रीमियम कार्ड्स में यह 50,000 रुपये या उससे अधिक हो सकता है। आपकी इनकम जितनी स्थिर और ऊंची होगी, लिमिट उतनी अधिक मिलने की संभावना बढ़ती है।
दूसरा प्रमुख फैक्टर क्रेडिट स्कोर (CIBIL या अन्य क्रेडिट ब्यूरो स्कोर) है। 750 से ऊपर का स्कोर अच्छा माना जाता है और इससे उच्च लिमिट मिल सकती है। स्कोर 700-750 के बीच होने पर भी अप्रूवल संभव है, लेकिन लिमिट मध्यम रहती है। यदि स्कोर कम है, तो लिमिट कम रखी जाती है या आवेदन रिजेक्ट हो सकता है। बैंक आपकी पेमेंट हिस्ट्री, पिछले कर्ज की समय पर अदायगी और क्रेडिट यूटिलाइजेशन रेशियो (CUR) को देखते हैं। CUR को 30% से कम रखना आदर्श है, यानी यदि कुल लिमिट 1 लाख है तो 30,000 से ज्यादा इस्तेमाल न करें।
तीसरा, आपके मौजूदा कर्ज और अन्य क्रेडिट कार्ड्स की लिमिट महत्वपूर्ण हैं। RBI के नियमों के अनुसार, यदि आपके पास कई क्रेडिट कार्ड हैं, तो बैंक आपकी कुल उपलब्ध क्रेडिट को ध्यान में रखते हुए नई लिमिट तय करते हैं। कार्डधारक से स्व-घोषणा या क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनी (CIC) से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुल कर्ज का आकलन किया जाता है। इससे ओवर-लेवरेजिंग रोकी जाती है।
RBI के मास्टर डायरेक्शन में स्पष्ट है कि क्रेडिट लिमिट कार्डधारक की चुकौती क्षमता के अनुसार तय की जानी चाहिए। बैंक बोर्ड-अप्रूव्ड पॉलिसी के तहत यह सुनिश्चित करते हैं कि लिमिट जिम्मेदारी से दी जाए। छात्रों या बिना स्वतंत्र आय वाले व्यक्तियों के लिए विशेष सावधानी बरती जाती है।
लिमिट बढ़ाने या बदलने के नियम
RBI के हालिया अपडेट्स के मुताबिक, बैंक बिना ग्राहक की स्पष्ट सहमति के क्रेडिट लिमिट नहीं बढ़ा सकते। पुरानी प्रथा में ऑटोमैटिक बढ़ोतरी होती थी, लेकिन अब लिखित या डिजिटल सहमति अनिवार्य है। चुप्पी या कोई जवाब न देना सहमति नहीं माना जाएगा।
ओवरलिमिट फीचर पर भी सख्ती है। दिसंबर 2025 से लागू नियमों के तहत बैंक ग्राहक की स्पष्ट अनुमति के बिना ओवरलिमिट सुविधा एक्टिव नहीं कर सकते। यदि अनुमति नहीं है, तो लिमिट पार होने पर ट्रांजैक्शन रद्द हो जाएगा और कोई ओवरलिमिट चार्ज नहीं लगेगा। ग्राहक को ऐप या इंटरनेट बैंकिंग में ट्रांजैक्शन कंट्रोल फीचर मिलता है, जहां वे ओवरलिमिट को कभी भी ऑन-ऑफ कर सकते हैं।
क्रेडिट लिमिट तय करने में मुख्य फैक्टर (तालिका)
लिमिट बढ़वाने के टिप्स
नियमित रूप से बिल समय पर चुकाएं।
CUR को 30% से नीचे रखें।
आय बढ़ने पर बैंक को अपडेट करें।
6-12 महीने अच्छा इस्तेमाल दिखाने के बाद लिमिट बढ़ाने का अनुरोध करें।
कई कार्ड्स होने पर कुल एक्सपोजर कम रखें।
| फैक्टर | प्रभाव लिमिट पर | आदर्श स्थिति |
|---|---|---|
| मासिक/वार्षिक आय | सीधा संबंध, अधिक आय = अधिक लिमिट | 25,000+ मासिक (एंट्री लेवल) |
| क्रेडिट स्कोर (CIBIL) | 750+ पर उच्च लिमिट, कम पर सीमित | 750-850 |
| क्रेडिट यूटिलाइजेशन | 30% से कम बेहतर, 50%+ नकारात्मक | 30% से नीचे |
| पेमेंट हिस्ट्री | समय पर भुगतान से बढ़ोतरी | कोई डिफॉल्ट नहीं |
| मौजूदा कर्ज/कार्ड्स | कुल क्रेडिट ज्यादा होने पर लिमिट कम | कुल CUR कम |
| नौकरी की स्थिरता | स्थिर जॉब से बेहतर लिमिट | 1-2 साल+ अनुभव |
RBI लगातार नियम अपडेट कर रहा है ताकि ग्राहक सुरक्षित रहें और क्रेडिट का दुरुपयोग न हो। अपनी लिमिट समझकर इस्तेमाल करने से क्रेडिट स्कोर मजबूत होता है और भविष्य में बेहतर ऑफर्स मिलते हैं।
Disclaimer: यह लेख सामान्य जानकारी और RBI दिशा-निर्देशों पर आधारित है। व्यक्तिगत सलाह के लिए बैंक या वित्तीय सलाहकार से संपर्क करें।